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Tuesday, September 10, 2013

jo khud ko khuda samajhate hain

उन लोगों के नाम एक पैगाम -----

जो खुद को खुदा समझते हैं ,
 जो देश के रहनुमा बनते हैं ,
कराते हैं दंगे , सकते हैं रोटियाँ ,
लाशों पर वोट की बिसात रचते हैं । ---------

लिखा था कभी हाथ पे ,सिकंदर ने मुकद्दर ,
हो गया था गुरुर उसको , होने का कलंदर ।
मिट गया था अहम् ,एक फ़क़ीर की बात से ,
खाली हाथ ही गया था , दुनिया से सिकंदर ।

डॉ अ कीर्तिवर्धन

2 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. सुन्दर और सामयिक रचना

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