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Wednesday, November 11, 2015

deep

दीपोत्सव पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं
दीप बनूँ और खुद जल जाऊं,
शिक्षा का अन्धकार मिटाऊं,
दे दो मुझको शक्ति इतनी, 
सारे जग से तम मैं मिटाऊं ।
डॉ अ कीर्तिवर्धन

Tuesday, October 27, 2015

ashk hota kaun sa anmol

अश्क होता कौन सा, अनमोल हमसे पूछिए,
बेटे के दर्द का हाल, माँ के अश्क से पूछिए।
मिलन की चाह में, प्रेयसी तड़फती जब कहीं,
विरह के अश्कों का मोल, तब उससे पूछिए।

अ कीर्तिवर्धन

Sunday, October 25, 2015

mahangi daal par

मित्रों, आजकल दाल की बढ़ी कीमतों पर बहुत हल्ला मचा है, बात सही भी है। मगर देखने में यह भी आ रहा है कि हल्ला मचाने वाले वह गरीब लोग नहीं हैं जो इससे प्रभावित हैं बल्कि वह लोग ज्यादा हैं जिन्हे केवल राजनीति की रोटियाँ सेकनी हैं।
यह तो सच है कि सम्बंधित सरकारों को जमाखोरों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करनी चाहिए और जनता को राहत मिलनी चाहिए मगर कुछ इस पर भी विचार करें----------

सस्ता चिकन भी ले लो, दाल भी ले लो,
दस रुपये किलो प्याज और आलू भी ले लो,
मगर लौट आओ उस दौर की आमद पर,
उसी दौर की तनख्वाह, मजदूरी भी ले लो।

वो स्कूल की पढ़ाई, वो शिक्षा का मतलब,
वो संस्कारों का रोपण, वो इन्सां का मजहब,
वो त्योहारों पर बनते नए कपड़ों की खुशियाँ,
ईद- दिवाली थे तब भाई- चारे का मकतब।

वह माँ का हाथ से मठरी- लड्डू बनाना,
कम खर्च करके भी घर को चलाना ,
बाज़ार के महंगे नाश्ते-मिठाइयों को छोडो,
मिल जाएगा अच्छे दिनों का खजाना।

दिखावे की आदत को ज़रा त्याग देखो,
सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजो,
मौसम की सब्जी व फल से हो गुजारा,
संतुष्टि का रास्ता तब वहाँ पर खोजो।

डॉ अ कीर्तिवर्धन

 

Tuesday, October 20, 2015

kar rahaa maan ka apakaar tu

सम्मान लौटाने वाले नकली साहित्यकारों (  माफ़ करना जो सम्मान का अर्थ ही नहीं जानते वह साहित्यकार हो ही नहीं सकते ) को समर्पित ----

कर रहा मान का अपकार तू,
कह रहा खुद को कलमकार तू।
साहित्य जिसके लिए है साधना,
बिक रहा स्वार्थ के बाज़ार तू।

शोहरतें तुझको मिली सम्मान से,
सर तेरा तन गया था अभिमान से।
भेदभाव जब कलमकार करने लगा,
साहित्य सहम गया निज अपमान से।

डॉ अ कीर्तिवर्धन

kar rahaa maan ka apakaar tu

सम्मान लौटाने वाले नकली साहित्यकारों (  माफ़ करना जो सम्मान का अर्थ ही नहीं जानते वह साहित्यकार हो ही नहीं सकते ) को समर्पित ----

कर रहा मान का अपकार तू,
कह रहा खुद को कलमकार तू।
साहित्य जिसके लिए है साधना,
बिक रहा स्वार्थ के बाज़ार तू।

शोहरतें तुझको मिली सम्मान से,
सर तेरा तन गया था अभिमान से।
भेदभाव जब कलमकार करने लगा,
साहित्य सहम गया निज अपमान से।

डॉ अ कीर्तिवर्धन

Monday, October 19, 2015

पत्थरों के शहर में हम, फूलों की तमन्ना करते हैं,
पत्थर को बुत, बुत को भगवान बनाया करते हैं।
यह सच है कि मुसाफिर हैं हम, तेरे शहर में,
जिस राह से गुजरते हैं, मुकाम बनाया करते हैं।

डॉ अ कीर्तिवर्धन

Sunday, October 18, 2015

baat samajh lo--umr huyi hai saath magar abhi yuva man hai

बात समझ लो --- उम्र हुयी है साठ, मगर अभी युवा मन है, बच्चों संग फिर शुरू हुआ, मेरा बचपन है। मुझको बूढ़ा कहने वालो, बात समझ लो, नयी पीढ़ी से ज्यादा, बूढ़ों में अभी दम है। गाँव की मिटटी में खेला और बड़ा हुआ हूँ, घी, दूध खा मजबूत हुआ, मेरा तन है। कोक- पैप्सी पीने वालों, बात समझ लो, गाय का घी- दूध आज भी सबसे उत्तम है। जल्दी उठना, समय से सोना, हमने सीखा, आयुर्वेद का सार, अध्यात्म का दर्शन है। देर रात तक जगने वालो, बात समझ लो, स्वस्थ रहे तन- मन, सदा यह नियम है। खाली बैठूँ- गप्प लड़ाऊँ या देखूँ पिक्चर, सोच सोच कर होती मुझको उलझन है। पढ़ना- लिखना, आगे बढ़ना, बात समझ लो, मेरी कवितायें ही, मेरे मन का दर्पण है। डॉ अ कीर्तिवर्धन