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Friday, February 28, 2014

kabhi nahi malaal rahe

कभी नहीं मलाल रहे -------

जाति धर्म के नारों से,जो लोग हैं खेल रहे,
विषधर काले जहरीले,अपने घर मे पाल रहे। 

बोओगे पेड़ बबुल का,आम नहीं पैदा होगा,
कांटे ही कांटे होंगे, इतना तुमको ख्याल रहे। 

आरक्षण का रक्त बीज, बोया सत्ता की खातिर,
वही बीज अब वृक्ष बने,धारण रूप विकराल रहे। 

बढ़ता जाता विष वृक्ष, अमर बेल की भांति है,
कब काटोगे जड़ से इसको, पूछ यही सवाल रहे ?

मानवता को धर्म बनालो, कुर्सी को सेवा आधार,
राष्ट्र धर्म बने जब प्रमुख, नहीं कभी मलाल रहे|


डॉ अ कीर्तिवर्धन

2 comments:

  1. ***आपने लिखा***मैंने पढ़ा***इसे सभी पढ़ें***इस लिये आप की ये रचना दिनांक03/03/2014 यानी आने वाले इस सौमवार को को नयी पुरानी हलचल पर कुछ पंखतियों के साथ लिंक की जा रही है...आप भी आना औरों को भी बतलाना हलचल में सभी का स्वागत है।


    एक मंच[mailing list] के बारे में---


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  2. तल्ख़ ...सुन्दर

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